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Wednesday, 17 December 2014

न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971

कोर्ट की कानूनी प्रक्रिया को अवरूद्ध करने का प्रयास व कोर्ट परिसर में इस प्रकार की हिंसा न्यायालय की अवमानना के दायरे में आती है। 
अभिलेख न्यायालय का अर्थ
-न्यायालय की कार्यवाही तथा निर्णय को दूसरे न्यायालय मे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकेगा
- न्यायालय को अधिकार है कि वो अवमानना करने वाले व्यक्ति को दण्ड दे सके यह शक्ति अधीनस्थ न्यायालय को प्राप्त नही है इस शक्ति को नियमित करने हेतु संसद ने न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 पारित किया है अवमानना के दो भेद है 
सिविल और आपराधिक।
जब कोई व्यक्ति आदेश निर्देश का पालन न करे या उल्लंघन   करे तो यह सिविल अवमानना है परंतु यदि कोई व्यक्ति न्यायालय को बदनाम करे जजों को बदनाम तथा विवादित बताने का प्रयास करे तो यह आपराधिक अवमानना होगी जिसके लिए कारावास जुर्माना दोनों को देना पडेग़ा वही सिविल अवमानना में कारावास संभव नहीं है यह शक्ति भारत में काफी विवादस्पद है।
कोर्ट की अवमानना के लिए सजा का प्रावधान
न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 के अनुसार दोषी के लिए 151 दिन की जेल का प्रावधान है। जो छह महीने तक बढ़ाई भी जा सकती है। या फिर 2000 हजार रूपए की जुर्माना राशि अदा करनी पडती है। किसी-किसी मामले में दोषी को सजा और जुर्माना दोनों हो सकता है। 
-इसके अलावा कोर्ट की अवमानना के दोषी व्यक्ति को क्षमा याचना करने की छूट होती है। जिसके द्वारा वह इस आरोप से मुक्ति पा सकता है। इस क्षमा याचिका में कोर्ट की अवमानना के कारण की व्याख्या की जाती है। कोर्ट बिना किसी मजबूत आधार के इस याचिका को ठुकरा नहीं सकती। 
-सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय किसी को भी इस सजा को बढाने का कोई विशेषाधिकार नहीं दिया गया है।
-कोर्ट की अवमानना के लिए यदि कोई कंपनी दोषी पाई जाती है तो सिविल अवमानना के दायरे में आती है। इस केस में सजा का हकदार वह व्यक्ति होगा, जिसके हाथ में उस वक्त कंपनी का चार्ज होगा। इस स्थिति में जो व्यक्ति केस की सुनवाई के दौरान कोर्ट में मौजूद होगा उसे कस्टडी में रखा जाएगा। उक्त व्यक्ति को अपने बचाव में कार्य करने का पूरा मौका दि जाने का प्रावधान है। इस अधिनियम एक विशेष बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति कुछ यथार्थ विषयों पर कोर्ट की आलोचना करता है तो उसे न्यायालय अवमानना की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसके तहत हाइकोर्ट को अपनी सहायक अदालतों की अवमानना के मामले में सजा देने का अधिकार प्राप्त है। उसी प्रकार उच्च न्यायालय को समान न्यायिक प्रकिया अपनाते हुए सहायक अदालतों की अवमानना के मामले में फैसला देने का अधिकार प्राप्त है।

मानहानि

मानहानि क्या है?
किसी व्यक्ति, व्यापार, उत्पाद, समूह, सरकार, धर्म या राष्ट्र के प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाने वाला असत्य कथन मानहानि (Defamation) कहलाता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के अनुसार-किसी के बारे में बुरी बातें बोलना, लोगों को अपमानजनक पत्र भेजना, किसी की प्रतिष्ठा गिराने वाली अफवाह फैलाना, अपमानजनक टिप्पणी प्रकाशित या प्रसारित करना। पति या पत्नी को छोड़कर किसी भी व्यक्ति से किसी और के बारे में कोई अपमानजनक बात कहना, अफवाह फैलाना या अपमानजनक टिप्पणी प्रकाशित करना मानहानि माना जा सकता है।
मानहानि के प्रकार 
  • मृत व्यक्ति को कोई ऐसा लांछन लगाना जो उस व्यक्ति के जीवित रहने पर उसकी ख्याति को नुकसान पहुंचाता । और उसके परिवार या निकट संबंधियों की भावनाओं को चोट पहुंचाता ।
  • किसी कंपनी , संगठन या व्यक्तियों के समूह के बारे में भी ऊपर लिखित बात लागू होती है ।
  • किसी व्यक्ति पर  व्यंग्य के रुप में कही गयी बातें ।
  • मानहानिकारक बात को छापना या बेचना ।
सच्ची टिप्पणी मानहानि नहीं
  • किसी व्यक्ति के बारे में अगर सच्ची टिप्पणी की गयी हो और वह सार्वजनिक हित में किसी लोक सेवक के सार्वजनिक आचरण के बारे में हो अथवा उसके या दूसरों के हित में अच्छे इरादे से की गयी हो अथवा लोगों की भलाई को ध्यान में रखते हुए उन्हें आगाह करने के लिए हो , तो इसे मानहानि नहीं माना जायेगा।
मानहानि के लिए कार्यवाही
  1. मानहानि के लिए आप आपराधिक मुकदमा चलाकर मानहानि करने वाले व्यक्तियों और उसमें शामिल होने वाले व्यक्तियों को न्यायालय से दंडित करवा सकते हैं ।
  2. यदि मानहानि से किसी व्यक्ति की या उसके व्यवसाय की या दोनों को कोई वास्तविक हानि हुई है तो उसका हर्जाना प्राप्त करने के लिए दीवानी दावा न्यायालय में प्रतिवेदन प्रस्तुत कर हर्जाना प्राप्त किया जा सकता है ।
  • मानहानि करने वाले के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के लिए दस्तावेजों के साथ सक्षम क्षेत्राधिकारी के न्यायालय में लिखित शिकायत करनी होगी।
  • न्यायालय शिकायत पेश करने वाले का बयान दर्ज करेगा, अगर आवश्यकता हुई तो उसके एक-दो साथियों के भी बयान दर्ज करेगा।
  • इन बयानों के आधार पर यदि न्यायालय समझता है कि मुकदमा दर्ज करने का पर्याप्त आधार उपलब्ध है तो वह मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए समन जारी करेगा।
  • आपराधिक मामले में जहां नाममात्र का न्यायालय शुल्क देना होता है । वहीं हर्जाने के दावे में जितना हर्जाना मांगा गया है , उसके 5 से 7.50 फीसदी के लगभग न्यायालय शुल्क देना पड़ता है । जिसकी दर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है।
  • मानहानि के मामले में वादी को केवल यह सिद्ध करना होता है कि टिप्पणी अपमानजनक थी और सार्वजनिक रुप से की गयी थी । उस यह सिद्ध करने की जरुरत नहीं है कि टिप्पणी झूठी थी।
  • बचाव पक्ष को ही यह साबित करना होता है कि वादी के खिलाफ उसने जो टिप्पणी की थी, वह सही थी ।
दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से बचाव
  • अगर किसी निर्दोष व्यक्ति को अभियुक्त को बना दिया जाय और वह सिद्ध कर सके कि उसे बदनाम या ब्लैकमेल करने जैसे बुरे इरादे से उसके खिलाफ अभियोग लगाया गया था तो वह अदालत में मामला दर्ज कर अभियोग लगाने वाले से मुआवजा मांग सकता है । यह दावा मानसिक तथा मानसिक दोनों प्रकार की चोट की भरपाई के लिए हो सकता है।
  • अगर किसी व्यक्ति को बुरे इरादे से सिविल मुकदमें में फंसाया जाय तो वह मामला दर्ज कर मुआवजे की मांग कर सकता है ।

समाचार पत्र का पंजीकरण



किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of expression) कहलाती है। व्यवहार में यह स्वतंत्रता कभी भी, किसी भी देश में, निरपेक्ष (absolute) स्वतंत्रता के रूप में नहीं प्रदान की जा सकती। अत: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हमेशा कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है।

अभिव्‍यक्‍ित की स्‍वतंत्रता अपने भावों और विचारों को व्‍यक्‍त करने का एक राजनीतिक अधिकार है। इसके तहत कोई भी व्‍यक्ति न सिर्फ विचारों का प्रचार-प्रसार कर सकता है, बल्कि किसी भी तरह की सूचना का आदान-प्रदान करने का अधिकार रखता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वभौमिक नहीं है और इस पर समय-समय पर युक्‍ितयुक्‍त निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। राष्‍ट्र-राज्‍य के पास यह अधिकार सुरक्षित होता है कि वह संविधान और कानूनों के तहत अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता को किस हद तक जाकर बाधित करने का अधिकार रखता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में, जैसे- वाह्य या आंतरिक आपातकाल या राष्‍ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर अभिव्‍यक्‍ित की स्‍वंतत्रता सीमित हो जाती है। संयुक्‍त राष्‍ट्र की सार्वभौमिक मानवाधिकारों के घोषणा पत्र में मानवाधिकारों को परिभाषित किया गया है। इसके अनुच्‍छेद 19 में कहा गया है कि किसी भी व्‍यक्ति के पास अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार होगा जिसके तहत वह किसी भी तरह के विचारों और सूचनाओं के आदान-प्रदान को स्‍वतंत्र होगा। हालांकि, इस अधिकार के साथ नागरिकों को विशेष दायित्‍व भी सौंपे गए हैं। एक मशहूर कहावत है कि आपकी स्‍वतंत्रता वहीं पर खत्‍म हो जाती है, जहां से दूसरे की नाक शुरू होती है। यानि इस अधिकार के तहत आप किसी को मानसिक, आर्थिक या दैहिक- किसी भी नुकसान नहीं पहुंचा सकते।

भारत में छपने तथा प्रकाशि‍त होने वाले समाचारपत्र एवं आवधि‍क प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम, 1867 तथा समाचारपत्रों के पंजीकरण(केन्‍द्रीय) नि‍यम, 1956 द्वारा नि‍यंत्रि‍त होते हैं ।
अधि‍नि‍यम के अनुसार, कि‍सी भी समाचार पत्र अथवा आवधि‍क का शीर्षक उसी भाषा या उसी राज्‍य में पहले से प्रकाशि‍त हो रहे कि‍सी अन्‍य समाचारपत्र या आवधि‍क के समान या मि‍लता‑जुलता न हो, जब तक कि‍ उस शीर्षक का स्‍वामि‍त्‍व उसी व्‍यक्‍ति‍ के पास न हो ।
इस शर्त के अनुपालन को सुनि‍श्‍चि‍त करने के लि‍ए ,भारत सरकार ने समाचारपत्रों का पंजीयक नि‍युक्‍त कि‍या है , जि‍न्‍हें प्रेस पंजीयक भी कहा जाता है, जो भारत में प्रकाशि‍त होने वाले समाचारपत्रों एवं आवधि‍कों की पंजि‍का का रख‑ रखाव करते हैं ।

प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम के अनुसार , मुद्रक एवं प्रकाशक को जि‍ला/महाप्रांत/उप‑प्रखण्‍ड दण्‍डाधि‍कारी के समक्ष घोषणा करनी होती है , जि‍सके स्‍थानीय अधि‍कारक्षेत्र के अधीन समाचारपत्र मुद्रि‍त अथवा प्रकाशि‍त कि‍या जाएगा, कि‍ वह उक्‍त समाचारपत्र का मुद्रक/प्रकाशक है ।

घोषणा पत्र में समाचारपत्र संबंधी सभी वि‍वरण शामि‍ल होने चाहि‍ए , जैसे कि‍ कि‍स भाषा में प्रकाशि‍त होगा ,प्रकाशन का स्‍थान इत्‍यादि‍ । समाचारपत्र के प्रकाशन से पहले दण्‍डाधि‍कारी द्वारा घोषणा पत्र को अधि‍प्रमाणि‍त कि‍या जाना चाहि‍ए ।

अधि‍प्रमाणन से पहले , दण्‍डाधि‍कारी समाचारपत्रों के पंजीयक से छानबीन करने के बाद यह पुष्‍टि‍ करता है कि‍ प्रेस एवं पुस्‍तक पंजीकरण अधि‍नि‍यम की धारा 6 में उल्‍लि‍खि‍त शर्तों का पालन हो रहा है ।

समाचार पत्र का पंजीकरण

समाचार पत्र के प्रथम अंक के प्रकाशन के बाद, आर.एन.आई. से समाचारपत्र को पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी करने का अनुरोध अवश्‍य कि‍या जाना चाहि‍ए । समाचार पत्रों/पत्रि‍काओं के पंजीकरण के लि‍ए जांच सूची/दि‍शा नि‍र्देश नि‍म्‍नलि‍खि‍त हैं :

1. आवश्‍यक दस्‍तावेज
(क) आर.एन.आई. द्वारा जारी शीर्षक सत्‍यापन पत्र की फोटोकापी ।
(ख) डी.एम./ए.डी एम/डी सी पी/सी एम एम/एस डी एम द्वारा प्रपत्र‑। में नि‍र्दिष्‍ट(देखें नि‍यम‑3) प्रमाणीकृत घोषणा की सत्‍यापि‍त प्रति‍ ।
(ग) प्रथम अंक में खंड‑1 और अंक­‑1 का उल्‍लेख करें !
(घ) नि‍र्धारि‍त प्रपत्र में ‘ कोई वि‍देशी बंधन नहीं ‘ के लि‍ए प्रकाशक का शपथ पत्र(देखें परि‍शि‍ष्‍ट‑IV) ।
2. यदि‍ मुद्रक और प्रकाशक भि‍न्‍न हों तो अलग घोषणा दाखि‍ल करनी होगी ।
3. प्रथम अंक में स्‍पष्‍ट रूप से खंड‑। और अंक‑1, दि‍नांक‑रेखा,पृष्‍ठसंख्‍या और प्रकाशन के शीर्षक का उल्‍लेख होना चाहि‍ए ।
4. घोषणा के प्रमाणीकरण की ति‍थि‍ से छह सप्‍ताह की अवधि‍ के भीतर (दैनिक‍/साप्‍ताहि‍क के लि‍ए) और तीन महीने के भीतर(अन्‍य अवधि‍यों वाले प्रकाशनों के लि‍ए) प्रकाशन प्रकाशि‍त हो जाना चाहि‍ए ।
5. इंम्‍प्रिं‍ट लाइन में(क) प्रकाशक का नाम(ख) मुद्रक का नाम,(ग) स्‍वामी का नाम,(घ) मुद्रणालय का नाम व पूरा पता,(ड.) प्रकाशन का स्‍थान व पता,और (च) सम्‍पादक का नाम शामि‍ल होना चाहि‍ए ।
2.11.2 यदि‍ उचि‍त जांच पड़ताल के पश्‍चात आवेदन संतोषजनक पाया जाता है तो प्रेस पंजीयक अपने यहां रखे गए रजि‍स्‍टर में समाचार पत्र के वि‍वरण दर्ज करेगा और प्रकाशक को पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करेगा ।
2.11 नई घोषणा करने पर नया/संशोधि‍त प्रमाण पत्र ले लें
2.12.1 जब भी कभी पैरा 2.6.1 के (क) से (ज) में उल्‍लि‍खि‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों में नई घोषणा की जाती है, तो संशोधि‍त पंजीकरण प्रमाण पत्र के लि‍ए प्रेस पंजीयक को आवेदन करना आवश्‍यक होगा । लेकि‍न यदि‍ नई घोषणा पैरा 2.6.1 के (झ) से (ड) में उल्‍लि‍खि‍त परि‍स्‍थि‍ति‍यों के अंतर्गत की गई हो तो संशोधि‍त प्रमाणपत्र जरूरी नहीं होगा ।

आवश्‍यक दस्‍तावेज नि‍म्‍नानुसार हैं :

(क) सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत नई घोषणा की सत्‍यापि‍त फोटोकापी, जि‍समें परि‍वर्तन(परि‍वर्तनों) का उल्‍लेख होगा ।
(ख) प्रकाशन के नवीनतम अंक की प्रति‍, जि‍समें सही इम्‍प्रिं‍ट लाइन,प्रकाशन का नाम तथा दि‍नांक रेखा हर पृष्‍ठ पर मुद्रि‍त हो ।
(ग) आर.एन.आई. कार्यालय द्वारा जारी मूल पंजीकरण प्रमाणपत्र ।
(घ) यदि‍ मूल पंजीकरण प्रमाणपत्र खो गया हो, नष्‍ट हो गया हो, चोरी चला गया हो, तो मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा हस्‍ताक्षरि‍त शपथपत्र तथा उसके साथ आर.एन.आई. के नाम पर 5 रूपए का भारतीय पोस्‍टल आर्डर देना होगा।
(ड.) स्‍वामि‍त्‍व के परि‍वर्तन की स्‍थि‍ति‍ में सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत स्‍वामि‍त्‍व सम्‍बन्‍धी अंतरण‑पत्र (ट्रांसफर डीड) की सत्‍यापि‍त फोटोकापी भी प्रस्‍तुत करनी होगी ।
(च) प्रकाशन के शीर्षक/भाषा के परि‍वर्तन की स्‍थि‍ति‍ में शीर्षक सत्‍यापन पत्र की एक प्रति‍ प्रस्‍तुत करनी होगी ।
2.13 प्रमाण पत्र खो गया है ? डुप्‍लि‍केट प्रमाण पत्र ले लें
2.13.1 जब मूल पंजीकरण प्रमाण पत्र खो जाए या खराब हो जाए या चोरी चला जाए तथा ऐसी परि‍स्‍थि‍ति‍ न हो, जि‍समें ऊपर बताए अनुसार नई घोषणा की जा सकती हो तो डुप्‍लीकेट पंजीकरण प्रमाण पत्र जारी करने के लि‍ए प्रेस पंजीयक को आवेदन दि‍या जा सकता है, जि‍सके साथ एक अलग पृष्‍ठ पर पूरा वि‍वरण देना होगा । कृपया ध्‍यान रखें यदि‍ प्रमाण पत्र खो गया है या चोरी चला गया है, तो पुलि‍स द्वारा दर्ज की गई प्राथमि‍की की एक प्रति‍ या पुलि‍स की मुहर लगी शि‍कायत की एक प्रति‍ जैसा पर्याप्‍त दस्‍तावेजी सबूत प्रस्‍तुत करना जरूरी होगा , जो दर्शाए कि‍ मामला सम्‍बद्द पुलि‍स अधि‍कारि‍यों को सूचि‍त कर दि‍या गया है।

वांछि‍त दस्‍तावेज नि‍म्‍नानुसार हैं:

(क) नोटरी या सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा उसके हस्‍ताक्षर व कार्यालय मुहर के साथ प्रमाणीकृत इस आशय का एक शपथपत्र ।
(ख) सम्‍बद्द मजि‍स्‍ट्रेट द्वारा प्रमाणीकृत नवीनतम घोषणा की सत्‍यापि‍त फोटोकापी ।
(ग) सही इम्‍प्रिं‍ट लाइन सहि‍त प्रकाशन के नवीनतम अंक की एक प्रति‍ 1
(घ) आर.एन.आई. के नाम पर 5 रूपए का भारतीय पोस्‍टल आर्डर ।
(ड.) ‘ कोई वि‍देशी बंधन नहीं ‘ के लि‍ए एक शपथ पत्र (देखें परि‍शि‍ष्‍ट‑।V) प्रकाशक द्वारा भेजी जाने वाली
नि‍यत कालि‍क सूचना/रि‍टर्न 1. प्रपत्र ‑II में वार्षि‍क वि‍वरण (देखें नि‍यम 6(i)
2. प्रपत्र‑IV में समाचारपत्र के स्‍वामि‍त्‍व का तथा अन्‍य वि‍वरण(देखें नि‍यम 8)
3. परि‍शि‍ष्‍ट‑ VIII के अनुसार दैनि‍क प्रेस का वि‍वरण
4. आयाति‍त अखबारी कागज का इस्‍तेमाल करने वाले प्रकाशक को परि‍शि‍ष्‍ट IX के अनुसार आयाति‍त अखबारी कागज की खरीद और खपत के बारे में भी रि‍टर्न भरनी होगी ।

3.1 अखबारी कागज़

3.1.1 इनमें से एक भारत सरकार की अखबारी कागज की नीति‍ के बारे में है । सरकार की वर्तमान नीति‍ इस प्रकार है:
क) अखबारी कागज के वार्षि‍क स्‍वदेशी उत्‍पादन का कम से कम एक ति‍हाई हि‍स्‍सा,छोटे और
मझौले समाचारपत्रों के लि‍ए आरक्षि‍त रखा जाएगा ।
ख) वास्‍तवि‍क उपभोक्‍ताओं को अखबारी कागज के आयात की अनुमति‍ है 1
3.1.2 छोटे या मझौले ? आपको स्‍वदेशी अखबारी कागज मि‍ल सकता है
3.1.3 अखबारी कागज नीति‍ के उदेश्‍य के लि‍ए, उन समाचार पत्रों को छोटा और मझौला समाचारपत्र माना गया है, जि‍नकी अखबारी कागज की वार्षि‍क खपत 200 मीटरी टन से अधि‍क नहीं है । वर्तमान में स्‍वदेशी अखबारी कागज प्राय: उपलब्‍ध है तथा छोटे व मझौले समाचार पत्रों को इस सम्‍बन्‍ध में कोई समस्‍या नहीं होगी । फि‍र भी, यदि‍ आवश्‍यक हो, तो इस श्रेणी के समाचार पत्र,आर.एन.आई. से ‘ पात्रता प्रमाण पत्र ‘ के लि‍ए आवेदन कर सकते हैं, जो परि‍शि‍ष्‍ट में दि‍ए गए प्रपत्र में दि‍या गया है जि‍सके आधार पर वे अनुसूचि‍त कागज कारखानों से स्‍वदेशी अखबारी कागज प्राप्‍त कर सकेंगे ।
3.1.4 पर्याप्‍त नहीं ? आप अखबारी कागज आयात कर सकते हैं
3.1.5 सरकार की वर्तमान नीति‍, वाणि‍ज्‍य मंत्रालय की अधि‍सूचना दि‍नांक 5.3.1997 तथा सूचना एवं प्रसारण
मंत्रालय की सार्वजनि‍क सूचना दि‍नांक 26‑3‑98 में प्रस्‍तुत की गई है । इसके अनुसार प्रत्‍येक पंजीकृत समाचार पत्र अखबारी कागज का आयात कर सकता है । इसके लि‍ए, समाचार पत्र के प्रकाशक/स्‍वामी को समाचार पत्र के पंजीयन प्रमाण पत्र को आर.एन.आई. से प्रमाणीकृत कराना होगा, जि‍सके आधार पर आयात की अनुमति‍ प्रदान की जाएगी । इस प्रयोजन के लि‍ए परि‍शि‍ष्‍ट‑VI में दि‍ए गए प्रपत्रों में आवेदन दि‍ए जा सकते हैं । आवेदन के साथ (क) समाचारपत्र के नवीनतम पंजीकरण प्रमाणपत्र की दो प्रति‍यां (ख) पि‍छले कैलेंडर वर्ष के लि‍ए वार्षि‍क वि‍वरण की सत्‍यापि‍त प्रति‍, और (ग)आवेदन की ति‍थि‍ से पि‍छले 12 महीनों के प्रत्‍येक महीने के लि‍ए एक‑एक नमूना अंक भेजने होंगे । लेकि‍न उन समाचारपत्रों को जि‍नकी शुरूआत और पंजीकरण के बाद एक वर्ष पूरा न हुआ हो,उन्‍हें ऊपर(ख)और(ग) में नि‍र्दि‍ष्‍ट दस्‍तावेज भेजने की आवश्‍यकता नहीं है । ऐसे मामलों में (क) में नि‍र्दि‍ष्‍ट दस्‍तावेजों के अलावा,प्रकाशन के प्रत्‍येक पूर्ण महीने का नमूना अंक प्रस्‍तुत कि‍या जाना चाहि‍ए ।
4.2 वार्षि‍क वि‍वरण
प्रत्‍येक प्रकाशक को समाचार पत्र के बारे में एक वार्षि‍क वि‍वरण प्रेस पंजीयक को भेजना होगा । यह वि‍वरण, समाचार पत्र पंजीकरण(केन्‍द्रीय)नि‍यम,1956 की अनुसूची के प्रपत्र ।। में देना होगा । देखें नि‍यम 6(i) ।
4.2.2 कैलेंडर वर्ष के अनुसार भेजे जाने वाले यह वि‍वरण अगले वर्ष के फरवरी माह के अंति‍म दि‍वस
से पहले/तक पहुंच जाना चाहि‍ए ।
4.2.3 जहां समाचार पत्र की प्रसार संख्‍या,प्रति‍ प्रकाशन दि‍वस 2000 से अधि‍क हो, वहां वार्षि‍क वि‍वरण
के साथ नि‍र्धारि‍त प्रपत्र के नीचे खंड‑ख के अनुसार चार्टर्ड एकाऊटेंट या योग्‍यता प्राप्‍त लेखा परीक्षक का प्रमाण पत्र प्रस्‍तुत करना होगा ।
4.2.4 समय से वार्षि‍क वि‍वरण दाखि‍ल न करने पर पी आर बी अधि‍नि‍यम के अंतर्गत दंडात्‍मक कार्रवाई की जा सकती है ।
(टि‍प्‍पणी: प्रेस पंजीयक को हर वर्ष देश में समाचार पत्रों की स्‍थि‍ति‍ के बारे में एक रि‍पोर्ट सरकार को देनी
होती है ,जो प्राय: प्रकाशकों से प्राप्‍त वार्षि‍क वि‍वरण के आधार पर होती है । इसलि‍ए ,समाचार पत्र प्रकाशक,कृपया प्रपत्र ।। में अपने वार्षि‍क वि‍वरण की सम्‍पूर्ण व सही‑सही जानकारी दें (देखें नि‍यम 6(।) । दैनि‍क समाचारपत्रों द्वारा परि‍शि‍ष्‍ट‑VIII में दि‍ए अनुसार एक वि‍वरण भी देना होगा । )
4.3 स्‍वामि‍त्‍व वि‍वरण
4.3.1 प्रत्‍येक वर्ष फरवरी के अंति‍म दि‍न के बाद नि‍कलने वाले प्रथम अंक में समाचार पत्र के
स्‍वामि‍त्‍व तथा अन्‍य सम्‍बन्‍धि‍त वि‍वरण प्रकाशि‍त कि‍या जाना चाहि‍ए । वि‍वरण समाचार पत्र पंजीकरण(केन्‍द्रीय)नि‍यम,1956 की अनुसूची में दि‍ए गए प्रपत्र IV में देना होगा(देखें नि‍यम 8) ।
4.5 क्‍या आपने अखबारी कागज आयात कि‍या है ? रि‍टर्न भरि‍ए !!!
4.5.1 समाचार पत्र के प्रकाशक/स्‍वामी को 30 सि‍तम्‍बर को समाप्‍त छमाही की
अर्ध‑वार्षि‍क रि‍टर्न और 31 मार्च को समाप्‍त वर्ष की वार्षि‍क रि‍टर्न क्रमश: 31 अक्‍टूबर और 30 अप्रैल तक भेजनी होगी, जि‍समें सम्‍बद्व अवधि‍यों में खरीदी तथा उपयोग की गई आयाति‍त अखबारी कागज की मात्राएं दि‍खाई जाएंगी । छमाही रि‍पोर्ट प्रकाशक/स्‍वामी द्वारा और वार्षिक रि‍पोर्ट चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा प्रमाणि‍त की जाएगी । रि‍टर्न का नमूना प्रपत्र परि‍शि‍ष्‍ट‑IX में दि‍या गया है ।
4.5.2 समय पर रि‍टर्न दाखि‍ल न करने या गलत जानकारी देने पर समाचार पत्र अखबारी कागज के
आयात के लि‍ए, पंजीयन प्रमाणपत्र के प्रमाणीकरण के लि‍ए अयोग्‍य हो जाएगा ।

जरूरी दस्‍तावेज इस प्रकार हैं :
(क) वर्ष‑‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए वार्षिक वि‍वरण की एक फोटोस्‍टेट प्रति‍ । दैनि‍क समाचारपत्रों के
प्रकाशक परि‍शि‍ष्‍ट VIII में नि‍र्धारि‍त प्रपत्र पर दैनि‍क प्रेस का वि‍वरण भी भेज सकते हैं ।
(ख) दैनि‍कों के मामलों में दि‍नांक ‑‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए कैलेंडर वर्ष ‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑‑के प्रत्‍येक
महीने के सात‑सात अंक और अन्‍य नि‍यतकालि‍क पत्रों के मामलें में सभी अकों का एक सैट । नवीनतम अंक की एक प्रति‍ भी भेजी जानी चाहि‍ए ।
(ग) मुद्रण मशीनों का वि‍वरण अर्थात् प्रत्‍येक मशीन का मेक,साइज,प्रति‍ घंटा गति आदि‍,मुद्रण
सारणी(पृष्‍ठवार) तथा अन्‍य मुद्रण कार्यों का वि‍वरण ,यदि‍ हो तो, साथ ही प्रिंट आर्डरों,मुद्रण प्रभार के बि‍लों और ‑‑‑‑‑‑‑‑महीने के लि‍ए भुगतान के प्रमाण स्‍वरूप प्राप्‍तकर्ता की रसीदों की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां ।
(घ) अखबारी कागज का वि‍वरण जि‍समें प्रथम दि‍वस का प्रारंभि‍क अधि‍शेष,वर्ष‑‑‑‑‑‑के
दौरान खरीदी मात्रा, वर्ष के दौरान कुल खपत तथा आलोच्‍य वर्ष के अंति‍म दि‍न
का अंति‍म अधि‍शेष ।
(ड.) आलोच्‍य वर्ष के लि‍ए कागज खरीदने के बि‍लों की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां तथा साथ ही
भुगतान के प्रमाण स्‍वरूप प्राप्‍तकर्ता की रसीदों की प्रति‍यां ।
(च) आपूर्ति स्‍त्रोत से प्रकाशन स्‍थान तक अखबारी कागज की ढुलाई से सम्‍बन्‍धि‍त बि‍लों की
फोटोस्‍टेट प्रति‍यां ।
(छ) एजेंट/हॉकर का नाम, स्‍टेशन,प्रेषि‍त प्रति‍यों की संख्‍या,प्रेषण माध्‍यम अर्थात् रेल,सड़क,डाक आदि‍,
प्राप्‍त भुगतान ,की प्रति‍यों के वि‍तरण का ब्‍यौरा देने वाला एक वि‍वरण जि‍सके साथ‑‑‑‑‑‑महीने के लि‍ए एजेंसी बि‍लों,एजेंटों/हॉकरों को जारी भुगतान रसीदों,प्रेषण रसीदों आदि‍ की फोटोस्‍टेट प्रति‍यां 1
(ज) कैलेंडर वर्ष ‑‑‑‑‑‑‑के लि‍ए लाभ‑हानि‍ खाता । यदि‍ लाभ‑हानि‍ खाता वि‍त्‍तीय वर्ष आधार पर
बनाया गया है, तो जनवरी से दि‍सम्‍बर‑‑‑‑‑‑‑तक माह‑वार बि‍क्री आय की प्रति‍यां प्रस्‍तुत की जानी चाहि‍ए, जि‍समें बेची गई प्रति‍यों की माह‑वार बि‍ल राशि‍ का उल्‍लेख हो ।
(झ) स्‍वामी की स्‍थायी आयकर संख्‍या, यदि‍ हो तो, लि‍खें ।
टि‍प्‍पणी: कृपया ध्‍यान दें कि‍ दस्‍तावेजों की प्रति‍यां और उनकी फोटोस्‍टेट प्रति‍ राजपत्रि‍त अधि‍कारी द्वारा
सत्‍यापि‍त कराके भेजी जाएंगी । यदि‍ असत्‍यापि‍त प्रति‍यां प्राप्‍त होती हैं, तो उन पर वि‍चार
नहीं कि‍या जाएगा ।

Tuesday, 16 December 2014

स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज



‘वेब’ की दुनिया में स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज का खास महत्त्व है। दिन-प्रतिदिन विकसित होती इंटरनेट टेक्नोलॉजी ने स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज के जानकारों के लिए भी सुनहरे अवसर पैदा किए हैं।

स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज या स्क्रिप्ट लैंग्वेज लैंग्वेजों की एक प्रमुख कैटगरी है, जो एक या अधिक सॉफ्टवेयर एप्लीकेशंस को कंट्रोल करने की सुविधा देती है। स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज को यदि हम आम भाषा में बोलें तो यह उसी प्रकार से काम करती है, जैसे कोई एक्टर पहले से लिखी गई स्क्रिप्ट के अनुसार अपना डायलॉग बोलता है। स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज की सहायता से हम स्क्रिप्ट लिखते हैं और यह स्क्रिप्ट दूसरे डाटा और सिस्टम से इंटरेक्ट करने के बाद एग्जिक्यूट होकर अपना काम पूरा करती है। स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज को लाइट वेट (light weight) प्रोग्रामिंग लैंग्वेज भी कहा जाता है।

आमतौर पर स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज को एचटीएमएल (HTML) के अंदर इम्बेड किया जा सकता है। ऐसा करने से वेब पेज की फंक्शनेलिटी को काफी बढ़ाया जा सकता है, जैसे विभिन्न प्रकार के मेन्यू स्टाइल, ग्राफिक्स डिस्प्ले, डायनामिक एडवरटाइजिंग आदि को हैंडल किया जा सकता है और इसे आकर्षक बना सकते हैं। स्पेशलाइज्ड ग्राफिक्स यूजर इंटरफेस (जीयूआई) के लिए भी इसका उपयोग करते हैं।

स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज को हम सर्वर और क्लाइंट से भी जोड़ कर देख सकते हैं। सर्वर-साइड स्क्रिप्टिंग एक तरह की वेब टेक्नोलॉजी है, जहां किसी यूजर की रिक्वेस्ट को प्रोसेस करने के लिए संबंधित स्क्रिप्ट को सीधे वेब सर्वर पर रन कर डायनामिक वेब पेज जनरेट किया जाता है। वहीं, क्लाइंट-साइट स्क्रिप्टिंग में स्क्रिप्ट को आमतौर पर वेब ब्राउजर में ही रन किया जाता है।

कंप्यूटर एजुकेशन से संबंध रखने वाले छात्रों के मन में आमतौर पर स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज और प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को लेकर काफी भ्रम बना रहता है। इंटरव्यू में भी इन दोनों लैंग्वेज के बीच के अंतर से संबंधित प्रश्न प्रमुखता से पूछे जाते हैं।

प्रोग्रामिंग लैंग्वेज (सी, सी++, विजुअल बेसिक) आदि में लिखे कोड्स को पहले कंपाइल करना जरूरी होता है। इसके बाद इसे रन किया जा सकता है। एक बार कंपाइल होने के बाद आप इसे कई बार रन कर सकते हैं। इन प्रोग्राम्स को रन करने से पहले एग्जिक्यूटेबल (executable) फाइल्स में परिवर्तित किया जाता है। इसके विपरीत स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज को कंपाइल करने की बजाए इंटरप्रेट किया जाता है। यहां एक कमांड को एक बार में इंटरप्रेट किया जाता है। इन्हें रन टाइम में इंटरप्रेट किया जाता है। कहने का मतलब है कि प्रत्येक बार जब आप प्रोग्राम को रन करना चाहते हैं तो हर बार एक अलग प्रोग्राम कोड्स को पढ़ेगा, फिर इसे इंटरप्रेट करने के बाद इन इंस्ट्रुक्शंस को एग्जिक्यूट किया जाता है।



जावास्क्रिप्ट
जावास्क्रिप्ट एक कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा है। यह एक स्क्रिप्टिंग भाषा है और मुख्यतः क्लाएंट साइड में वेबपेज के निर्माण में प्रयुक्त होती है।
प्रमुख विशेषताएं
जाल पृष्ठों के गत्यात्मक (dynamic) बनाने में उपयोगी
क्लाएंट साइड में (प्रयोक्ता के कम्प्यूटर पर) चलती है।
यह एक इन्टरप्रिटेड भाषा है।
आब्जेक्ट ओरिएन्टेड भाषा है।
इसमें प्रथम श्रेणी के फंशन हैं।
जावास्क्रिप्ट का सिन्टैक्स, सी के सिन्टैक्स से प्रभावित है।
जावास्क्रिप्ट का वास्तविक नाम "ECMAScript" है।

यद्यपि इसके नाम में जावा शब्द आया हुआ है, तथापि इसका जावा नामक प्रोग्रामन भाषा से कोई सम्बन्ध नही है। हाँ, जावा तथा जावास्क्रिप्ट दोनो का सिन्टैक्स, सी के सिन्टैक्स से प्रभावित है। जावास्क्रिप्ट की डिजाइन के मुख्य सिद्धान्त सेल्फ (Self) नामक प्रोग्रामिंग भाषा से लिये गये हैं।
जावास्क्रिप्ट के विभिन्न उपयोग
जावास्क्रिप्ट, एचटीएमएल डिजाइनरों के लिये प्रोग्रामिंग की सुविधा प्रदान करती है।
जावास्क्रिप्ट, एचटीएमएल पृष्ठों में गतिशील टेक्स्ट (dynamic text) डालने की सुविधा देती है।

उदाहरणः

document.write("<h1>" + name + "</h1>")

उपरोक्त जावास्क्रिप्ट स्टेटमेन्ट, किसी HTML पेज में चर-पाठ (variable text) लिखने के लिये प्रयोग किया जा सकता है।
जावास्क्रिप्ट, घटनाओं (events) के अनुसार वांछित प्रतिक्रिया करने के लिये उपयोग की जाती है। उदाहरण के लिये किसी एचटीएमएल पेज के किसी बटन पर क्लिक करने पर कोई पूर्व-निर्धारित कार्य करने के लिये।
जावास्क्रिप्ट, elements को पढ़ या लिख सकती है। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी HTML पेज के किसी अवयव के बारे में जानकारी प्राप्त करके उसे बदला या हटाया जा सकता है। इस तरह उस पेज को परिवर्तित कर सकते हैं।
जावास्क्रिप्ट, आंकड़ों की जाँच-परख कर सकती है। किसी फार्म के प्रयोक्ता द्वारा उस फार्म में भरे गये आंकडों को पहले जाँच लेने के बाद सर्वर के पास भेजने से सुविधा हो जाती है। इससे सर्वर का समय बचता है और प्रयोक्ता को भी त्रुटियों की जानकारी जल्दी हो जाती है।
जावास्क्रिप्ट, किसी पेज पर आये आगन्तुक () के ब्राउजर के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती है। इसका उपयोग करके उस ब्राउजर के अनुकूल समुचित व्यवहार कर सकती है ताकि वह पेज सभी ब्राउजरों में ठीक से दिखाया जा सके।
जावास्क्रिप्ट का प्रयोग कुक्की (cookies) के निर्माण में किया जा सकता है।

वेब पेज

कुछ लोग यह सोचते हैं कि किसी खास सॉफ्टवेयर या किसी खास वेबसाइट पर मौजूद टूल उनके लिए एक बेहतरीन वेबसाइट तैयार कर सकते हैं। लेकिन ऐसा कोई जादुई सॉफ्टवेयर या टूल मौजूद नहीं है जो आपके लिए खुद-ब-खुद एक बेहतरीन वेबसाइट तैयार कर दे। अच्छी वेबसाइट बनाना आपकी क्रिएटिविटी तकनीक के साथ तालमेल तैयारी और मेहनत पर निर्भर करता है। आनन-फानन में वेबसाइट तैयार करने वाले टूल अमेचर यूजर्स के लिए जरूर अनुकूल हो सकती हैं लेकिन प्रफेशनल्स के लिए ये शायद ही कुछ काम के हों। फिर भी ,ऐसी कुछ सुविधाओं पर भी हम इस सीरीज के दौरान चर्चा करेंगे। हमारा फोकस इस बात पर ही रहेगा कि आप कायदे की एक वेबसाइट बना सकें। 

अपनी वेबसाइट बनाने और होस्ट करने से पहले आपको उसके डिजाइन रंग-रूप कॉन्टेन्ट फीचर्स ढांचे ,इंटरऐक्टिविटी वगैरह के बारे में कुछ जरूरी फैसले करने होंगे। दूसरा भले ही आपको विशेष तकनीकी जानकारी न हो फिर भी कुछ तकनीकी मुद्दों पर आपको ही सोचना होगा। बेशक हमारी मदद से। 

डिजाइन और कॉन्टेंट के नियम 
ज्यादातर लोग अपनी वेबसाइट को रंग-बिरंगी और तरह-तरह के ऐनिमेशन से भरी हुई बनाना चाहते हैं। लेकिन जिस तरह कपड़े वही अच्छे होते हैं जो आपको नहीं दूसरों को अच्छे लगें उसी तरह वेबसाइट का डिजाइन भी वही बेहतर है जो औरों को पसंद आए। डिजाइन बनाने/बनवाने से पहले इन बातों पर ध्यान दें : - साइट दिखने में सादी , स्तरीय और आकर्षक हो , बचकानी नहीं। 

यहां फोकस उन्हीं जानकारियों पर रहना चाहिए जो आप साइट पर आने वालों को देना चाहते हैं। जैसे आपके प्रॉडक्ट सर्विसेज़ क्लाइंट्स की लिस्ट खासियतें वगैरह। 

साइट बनाने के पीछे एक बुनियादी मकसद होना चाहिए और वही सबसे ऊपर दिखना भी चाहिए। अगर आप इनवर्टर बनाते हैं, तो होमपेज पर ही आपके इनवर्टर की तसवीरें और उनसे जुड़े कुछ प्रमुख बिंदु दिखाई दे जाने चाहिए। बाकी जानकारी भीतर के पेजों पर दी जा सकती है। 

पाठक को एक नजर में ही आपके काम का आइडिया मिल जाना चाहिए। कोई भी उन्हें वेबसाइट के दूसरे हिस्सों में जाकर ढूंढने वाला नहीं है। 

बेवजह के ऐनिमेशन विडियो चित्र म्यूजिक आदि साइट का स्तर घटाते हैं और बेवजह लोगों का ध्यान इधर-उधर की चीजों में भटकाते हैं। ऐसी चीजें बच्चों के क्लास प्रॉजेक्ट्स में ही अच्छी लगती हैं। हां अगर वे आपके काम से जुड़े हैं तो जरूर इस्तेमाल करें। 

हर शख्स के पास तेज रफ्तार वाला इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता इसलिए किसी भी वेब पेज पर डाले जाने वाले कॉन्टेंट का आकार सीमित होना चाहिए। जिन चित्रों विडियो ऐनिमेशन्स आदि को पेज पर डालना चाहते हैं उनकी फाइलों का साइज देखें। एक पेज पर जाने वाली सब चीजों का आकार 100 केबी तक रहे तो पेज हर किस्म के ब्रॉडबैंड कनेक्शन पर आसानी से खुल जाएगा। यहां तक कि मोबाइल फोन पर भी। 

आप अपने चित्रों फोटो आदि की फाइल का आकार घटा भी सकते हैं। इसके लिए फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर या netmechanic.com जैसी इंटरनेट साइट की मदद लें। 

साइट पर सिर्फ सटीक और जरूरी जानकारियां डालें। यह सोचकर बेवजह पन्नों की संख्या या साइज बढ़ाने की जरूरत नहीं है कि बड़ी साइट आपकी बड़ी इमेज बनाएगी। 

शुरुआत में सब कुछ आसान रखें। नए फीचर सर्विसेज़ कॉन्टेंट आदि बाद में भी जोड़ते रह सकते हैं। 

पॉप-अप विंडोज (लिंक दबाने पर अलग से खुलने वाली ब्राउजर विंडो) का इस्तेमाल न करें। 

अच्छी और कामयाब साइट के गुर 
साइट जल्दी खुलनी चाहिए 
एक से दूसरे पेज में जाना आसान हो (ईजी नैविगेशन) 
हमेशा ताजा सूचनाएं मौजूद हों (अपडेटेड) 
कभी बंद न हो (मिनिमम डाउनडाइम) 
ईमेल का जवाब देने की व्यवस्था हो 
सर्च इंजनों (गूगल बिंग याहू आदि) में प्रमुखता से दिखे 
स्पेलिंग या ग्रामर की अशुद्धियां न हों 
हर तरह के ब्राउजर (इंटरनेट एक्सप्लोरर क्रोम फायरफॉक्स सफारी आदि) पर खुले और एक-सी दिखे 
वेबपेजों की लंबाई-चौड़ाई (रिजॉल्यूशन) ऐसा हो कि हर साइज के मॉनिटर पर दिखाई दे। पेज इतना चौड़ा न हो कि लोगों को स्क्रॉल बार का इस्तेमाल करना पड़े। 
डोमेन नेम कभी एक्सपायर नहीं होना चाहिए और न ही वेब होस्टिंग अकाउंट। 

किसी भी वेबसाइट के चार सबसे अहम तत्व हैं: 
1. मकसद काम या संदेश जिसके लिए वह बनी है 
2. ढांचा या स्ट्रक्चर 
3. कॉन्टेंट या सामग्री 
4. डिजाइन इंटरफेस या लेआउट 

वेबसाइट बनाना शुरू करने से पहले इन चारों के लिए तैयारी और रिसर्च जरूरी है। 
1. मकसद काम या संदेश हर वेबसाइट कोई न कोई मकसद पूरा करने के लिए बनाई जाती है। वह पहले से ही साफ होना चाहिए ताकि बेवजह इधर-उधर भटके बिना आप अपनी जरूरतों के मुताबिक सटीक वेबसाइट तैयार कर सकें। आपकी वेबसाइट का होमपेज खुलते ही यह मकसद आपके पाठकों को भी साफ हो जाना चाहिए। 

2. वेबसाइट का ढांचा एक प्रफेशनल वेबसाइट में हर वह सूचना या उसके अंश मौजूद होने चाहिए जो आपके ग्राहकों या पाठकों के लिए अहम हो सकती है। जैसे, होमपेज, आपके बारे में, आपकी सेवाएं या उत्पाद, नई खबरें नए उत्पादों का ब्योरा, पूछे जाने वाले सवाल, बड़े ग्राहकों का ब्योरा आपके बारे में उनकी राय, डाउनलोड सामग्री (मीडिया और निवेशकों के लिए), ईमेल और डाक भेजने के लिए ब्योरा तथा संपर्क पेज (Contact Us 

3. कॉन्टेंट या सामग्री जो जुटानी होगी कंपनी का लोगो हर वेब पेज पर डाला जाने वाला ब्योरा, प्रॉडक्ट्स और सेवाओं से जुड़ी तस्वीरें, गतिविधियों इवेन्ट्स उपलब्धियों से जुड़े चित्र, ऑफिशल ईमेल अड्रेस, डाउनलोड के लिए डाली जाने वाली सामग्री (पीडीएफ कैटलॉग फॉर्म आदि), डिजाइन के लिए आकर्षक ग्राफिक्स बैकग्राउंड इमेज आदि। 

4. अच्छा डिजाइन कैसे बने हर शख्स डिजाइनर नहीं होता और न ही सबके पास अपनी कल्पनाओं को हकीकत में ढालने की क्षमता होती है। लेकिन पहले तैयारी की जाए तो आपकी वेबसाइट आपकी कल्पना के ज्यादा करीब आ सकती है। 

इंटरनेट पर रिसर्च करें और कुछ अच्छी वेबसाइटों के डिजाइन देखें। 
अपने मुकाबले वाली कंपनियों की वेबसाइटों को देखें। 
उन सुविधाओं और फीचर्स की सूची तैयार करें जो आप साइट में चाहते हैं। 
एक सादे कागज पर आपकी भावी वेबसाइट का चित्र या नक्शा खींचने का प्रयास करें। 

इन चारों चरणों में इकट्ठी की गई सामग्री अपने वेब डिजाइनर को दें। अगर आप खुद साइट बनाने का इरादा रखते हैं तो वेब डिवलपमेंट शुरू करने से पहले इसे तैयार रखें। 

काम शुरू करने से पहले जान लें 
आपकी वेबसाइट कोई सिंगल फाइल नहीं बल्कि कई फाइलों (वेब पेजों) का ग्रुप है जिन्हें आपस में लिंक किया जाता है। 

इन फाइलों के एक्सटेंशन . htm, .html, .asp, .php, .asp&, .jsp आदि होते हैं। 

साइट का होमपेज वह है जो वेबसाइट का अड्रेस डालने पर सबसे पहले दिखाई देता है। 

जिस वेबसाइट में होमपेज नहीं है वह पूरी की पूरी वेबसाइट ही ब्राउजर में नहीं खुलेगी क्योंकि आपका होमपेज साइट का प्रवेश द्वार है। 

वेब पेज स्टैटिक भी हो सकते हैं और डायनैमिक भी। स्टैटिक पेज वह है जिसमें दी गई सूचनाएं लंबे वक्त तक नहीं बदलतीं। डायनैमिक पेज की जानकारी तेजी से बदलती रहती है। जैसे अखबारों की वेबसाइटें जिन पर रोज नई खबरें दिखती हैं। 

स्टैटिक होमपेज की फाइल का नाम अमूमन inde&.htm, default.htm होता है। 

डायनैमिक वेबपेज बनाने के लिए सर्वर साइड स्क्रिप्टिंग लैंग्वेज (डॉट नेट पीएचपी रूबी पर्ल जेएसपी आदि) का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसी साइटों के होमपेज का फाइल नाम default.asp&, inde&.phpजैसा होता है। 

वेब पेजों को पहले अपने कंप्यूटर में तैयार किया जाता है। उसके बाद उन्हें वेब सर्वर पर डाला (अपलोड किया) जाता है। इसके लिए FTP सॉफ्टवेयरों का इस्तेमाल किया जाता है। ये सॉफ्टवेयर आपके और आपके वेब सर्वर के बीच उसी तरह फाइलों का ट्रांसफर कर सकते हैं जैसे आप अपने कंप्यूटर में एक जगह से दूसरी जगह पर करते हैं। 

वेब पेजों को तैयार करने के लिए कुछ खास सॉफ्टवेयरों का इस्तेमाल किया जाता है। इन्हें WYSIWYG कहा जाता है जिसका अर्थ है- What you see is what you get, यानी जैसा डिजाइन किया हुआ पेज आपको अपनी स्क्रीन पर दिख रहा है वैसा ही इंटरनेट पर भी दिखेगा। 

खास-खास वेब पेज डिजाइन सॉफ्टवेयर (चार्जेबल) 
ये सॉफ्टवेयर वेब पेज डिजाइन और डिवलपमेंट के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इनका इस्तेमाल माइक्रोसॉफ्ट वर्ड जितना ही आसान है हालांकि HTML (वेब पेज बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कंप्यूटर लैंग्वेज या फॉर्मैट) की जानकारी होना बेहतर है। 

-Microsoft Expression Web 
-Adobe Dreamweaver 
-Microsoft FrontPage 
-Adobe GoLive 
-Adobe Contribute 
-Microsoft Sharepoint Designer 
-Microsoft Visual Web designer 
-Microsoft Publisher 
इनमें से पहले तीन सॉफ्टवेयर सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। 

MS Word से बनाएं वेबसाइट 
आप चाहें तो Microsoft Word में ही अपनी फाइल तैयार कर उसे वर्ड फॉर्मैट ( .doc ) के बजाय वेब फॉर्मैट (. htm या . html ) में सेव कर सकते हैं। बस हो गया आपका वेब पेज तैयार। 

इस फॉर्मैट में सेव करने के लिए अपनी वर्ड फाइल तैयार करने के बाद Save As विकल्प का इस्तेमाल करें और वहां बॉक्स में दिखने वाले फॉर्मैट्स की सूची में वेब पेज (. html ) चुन लें। इस विकल्प तक पहुंचने के लिएMicrosoft Office 2007 और आगे के सॉफ्टवेयरों में Other Format बटन भी दबाना होगा। 

फाइल का नाम कुछ भी रखा जा सकता है लेकिन यदि आप उसे वेबसाइट का होमपेज बनाना चाहते हैं तो नाम रखें- index.html 

जहां यह फाइल सेव हुई है वहां उसके आइकन पर क्लिक करके देखें। फाइल एमएस वर्ड में नहीं बल्कि इंटरनेट एक्सप्लोरर या आपके दूसरे वेब ब्राउजर में खुलेगी। यानी अब वह वर्ड फाइल नहीं रही बल्कि वेब पेज में बदल चुकी है।