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Tuesday, 22 November 2016

न्यूज सोर्स (समाचार स्त्रोत)

न्यूज सोर्स (समाचार स्त्रोत)

समाचार किसी भी समाचार पत्र, पत्रिका या चैनल की आत्मा होती है। जिस समाचार पत्र को ज्यादा पढ़ा जाता है या जो समाचार पत्र लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय होता है उसे ही कोई भी कंपनी विज्ञापन देना पसंद करती है। लोग उसी समाचार पत्र को पढ़ते हैं जिसकी खबरें विश्वसनीय होती हैं। अत: विश्वसनीय खबरों के लिए अच्छे NEWS SOURCE (समाचार स्त्रोत)भी होने चाहिए।
जिस समय हमारे पास इंटरनेट नहीं था उस समय समाचार स्त्रोत 3 प्रकार के होते थे। ये तीनों प्रकार निम्न है।

1. ज्ञात स्त्रोत- समाचार प्राप्त करने के लिए ऐसे स्त्रोत जिनकी आशा, अपेक्षा या अनुमान हमे पहले से ही होता है इस प्रकार के स्त्रोत ज्ञात स्त्रोत कहलाते हैं।
उदाहरण- पुलिस स्टेशन, ग्राम पालिका, नगर पालिका, अस्पताल, न्यायालय, मंत्रालय, श्मशान, विविध समितियों की बैठकें, सार्वजनिक वक्तव्य, पत्रकार सम्मेलन, सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं के सम्मेलन, सभा-स्थल पर कार्यक्रम आदि समाचार के ज्ञात स्त्रोत हैं।
मान लीजिए आपको किसी क्राइम की खबर की रिपोर्टिंग करनी है तो उसके लिए आपको पहले से ही पता है कि क्राइम की खबर पुलिस स्टेशन में मिलेगी। अथार्त हमें पहले से ही ज्ञात है कि कौन सी खबर कहां मिलेगी इसे ही ज्ञात स्त्रोत कहेंगे।

2.अज्ञात स्त्रोत- समाचार प्राप्त करने के लिए ऐसे स्त्रोत जिनकी आशा व अपेक्षा नहीं होती और जहां से समाचार अचनाक प्राप्त होते हैं समाचार प्राप्ति के अज्ञात स्त्रोत कहलाते हैं। सरल भाषा में हम कह सकते हैं कि वैसे स्त्रोत जिनके बारे में हमें पता नहीं होता। उदाहरण के लिए अचानक से कहीं सड़क हादसा हो गया।

3.पूर्वानुमानित स्त्रोत- समाचार प्राप्त करने के वैसे स्त्रोत जिनके बारे में पहले से अनुमान लगाया गया हो पूर्वानुमानित स्त्रोत कहलाते हैं।
उदाहरण के लिए हम मौसम का पुर्वानुमान लगा सकते हैं और पुर्वानुमान पर ही ज्यादातर मौसम की खबरें प्रकाशित होती हैं।
अगर किसी मोहल्ले में गंदगी है तो हम ये अनुमान लगाकर स्टोरी कर सकते हैं कि यहां कोई बीमार होगा या होने वाला है।
जब हम किसी नेता से मिलने जाते हैं तो हम ये अनुमान लगा सकते हैं कि महोदय किस विषय पर विचार रखेंगे या कौन सा विवादीत बयान दे सकते हैं।
हम यह कह सकते हैं कि पूर्वानुमानित स्त्रोत ऐसे स्त्रोत हैं जो हमें अलर्ट रखते हैं।

समाचार के अन्य स्त्रोत-

इंटरनेट के आने के बाद सूचना के क्षेत्र में गजब की क्रांति आई। इसमें कोई दोराय नहीं कि इक्कीसवीं सदी में सूचना क्रांति की धमक के साथ पाठक या दर्शक भी इतना जिज्ञासु हो चुका है कि समय बीतने से पहले वह सब कुछ जान लेना चाहता है, जो उससे जुड़ा है और उसकी रुचि के अनुरूप है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि समाचारों के परम्परागत स्त्रोतों और नये उभरते स्त्रोतों के बीच सार्थक समन्वय स्थापित करके वह सब कुछ समाचार के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाए, जो डिमांड में है। कुछ ऐसे ही महत्वपुर्ण समाचार स्त्रोत निम्न हैं।

1. REPORTER (संवाददाता)
किसी भी मीडिया संस्थान के लिये सबसे सटिक समाचार स्त्रोत उसका अपना रिपोर्टर ही होता है। रिपोर्टर द्वारा दी गई जानकारी या खबर पर ही संस्थान को सबसे ज्यादा विश्वास होता है। इसलिये किसी कवरेज पर गये संवाददाता की रिपोर्ट को प्राथमिकता दी जाती है और उस कवरेज से जुड़ी विज्ञप्तियों को नकार दिया जाता है।
बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में रिपोर्टरों की एक लंबी टीम होती है। समाचारों में विषयवस्तु के हिसाब से ही संवाददाताओं को तैनात किया जाता है। आज कल राजनीतिक दलों के लिये अलग – अलग रिपोर्टर, शिक्षा-संस्कृति, साहित्य, खेल, अर्थ, विज्ञान, फैशन, न्यायालय, सरकारी कार्यालयों के लिए अलग रिपोर्टर या पुलिस और अपराध आदि विषयों व विभागों की खबरों के लिये क्राइम रिपोर्टर रखना हर संस्थान के लिए जरुरी हो गया है । आजकल लगभग हर मीडिया संस्थान समाचार के बाजार में अपना कब्जा बनाने के लिये छोटे – छोटे गांवों और पिछड़े बाजारों में भी अपना रिपोर्टर तैनात करता है।

2. NEWS AGENCY
रिपोटर्स के बाद समाचार प्राप्त करने का दूसरा स्त्रो न्यूज एजेंसियां हैं। देश – विदेश की कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिये मीडिया संस्थान को इन्हीं पर निर्भर रहना पड़ता है। छोटे और कुछ मझोले संस्थान तो पूरी तरह इन्हीं पर निर्भर होते हैं। देश के दूरदराज इलाकों व विदेशों के विश्वसनीय समाचार प्राप्त करने का यह सस्ता व सुलभ साधन है।
अपने देश में मुख्य रुप से चार राष्ट्रीय न्यूज एजेंसियां काम कर रही हैं। ये हैं यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई), प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया (पीटीआई), यूनीवार्ता और भाषा। यूएनआई और पीटीआई अंग्रेजी की न्यूज एजेंसी हैं, जबकि यूनीवार्ता व भाषा इन्हीं की हिन्दी समाचार सेवाएं हैं। इनके अलावा समाचार चैनलों के लिए एएनआई है जो वीडियो सेवा उपलब्ध करवाता है।

3. INTERNET
आज के समय में समाचारा प्राप्त करने का इंटरनेट एक महत्वपूर्ण स्त्रोत बन गया है। दफ्तर में बैठे-बैठे एक क्लीक से हम देश भर के तमाम सामाचार जान सकते हैं और उनका प्रयोग कर सकते हैं। सच कहा जाये तो इंटरनेट और इंट्रानेट ने समाचार पत्रों व उनके कार्यालयों की शक्ल ही बदलकर रख दी है। बहुतेरे समाचारों के इंटरनेट संस्करण भी निकाले जा रहे हैं। कई समाचार पत्र तो इंटरनेट के भरोसे ही देश – विदेश का पूरा पृष्ठ प्रकाशित करते हैं। इंटरनेट पर फोटो के साथ-साथ समाचारों के विजुअल भी आसानी से प्राप्त हो जाते हैं।कई लोग तो अपने द्वारा ली गई वीडियो या समाचार इंटरनेट के माध्यम से वायरल कर रहे हैं। आज के समय में फेसबुक और ट्वीटर जैसी साइटों से भी समाचार मिलने लगे हैं। आजकल नेता समचार चैनलों पर बयान देने के बजाय ट्वीटर पर ट्वीट करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

4. PRESS RELEASE (विज्ञप्तियां)
विज्ञप्तियां समाचारों की बहुत बड़ी स्त्रोत होती हैं। कई बार समाचार पत्र के पृष्ठों को भरने के लिये ताजा समाचार उपलब्ध ही नहीं होते, ऐसे में ऑफिस में आईं विज्ञप्तियां यानी प्रेस नोट मह्तवपुर्ण भूमिका निभाती हैं। प्राय: विज्ञप्तियां दो प्रकार की होती हैं – सामान्य और सरकारी विज्ञप्तियां।
प्रेस विज्ञप्तियाँ- सरकारी विभाग, सार्वजनिक अथवा व्यक्तिगत प्रतिष्टान तथा अन्य व्यक्ति या संगठन अपने से सम्बन्धित समाचार को सरल और स्पष्ट भाषा में लिखकर समाचार-पत्र के कार्यालयों में प्रकाशन के लिए भेजवाते हैं। सरकारी विज्ञप्तियाँ चार प्रकार की होती हैं।
 (अ) प्रेस कम्युनिक्स- शासन के महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस  कम्युनिक्स के माध्यम से समाचार-पत्रों को पहुँचाए जाते हैं। इनके सम्पादन की आवष्यकता नहीं होती है। इस रिलीज के बाएँ और सबसे नीचे कोने पर सम्बन्धित विभाग का नाम, स्थान और निर्गत करने की  तिथि अंकित होती है।
 (ब) प्रेस रिलीज- शासन के अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण निर्णय प्रेस रिलीज के द्वारा समाचार-पत्र के कार्यालयों को प्रकाषनार्थ भेजे जाते हैं। जैसे रेल भाड़ा अथवा  ब्याज-दरों में वृद्धि।
 (स) हैण्ड आउट- दिन-प्रतिदिन के मन्त्रालय के क्रिया-कलापों की सूचना हैण्ड-आउट    के माध्यम से दी जाती है। यह प्रेस इन्फारमेशन ब्यूरो द्वारा प्रसारित किए जाते हैं।
 (द) गैर-विभागीय हैण्ड आउट- मौखिक रूप से दी  गई सूचनाओं को गैर-विभागीय हैण्ड आउट के माध्यम से प्रसारित किया जाता है।

5. जनसंपर्क
हम जानते हैं कि वही संवाददाता सफल हो पाता है, जो नित्य एक नये आदमी से मिलता है या उससे संपर्क बनाता है। यह सच है कि बहुत से समाचार आम आदमी के माध्यम से ही संवाददाता तक पहुंचते हैं। भले ही आम आदमी संवाददाता को मात्र एक सूत्र पकड़ाते हैं और पूरे समाचार का ताना-बाना स्वयं संवाददाता को ही बुनना पड़ता है, लेकिन आम आदमी का संवाद सूत्र में कार्य कर देना ही समाचार पत्र या समाचार चैनल के प्रचार – प्रसार के लिये काफी होता है। सच्चाई यह भी है कि यदि किसी समाचार पत्र या चैनल के लिये आम आदमी सूत्र की तरह काम करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि अमुक समाचार पत्र या चैनल की लोकप्रियता बहुत अधिक बढ रही है।
हम यह कह सकते हैं कि कुशल संवाददाता वही होता है, जिसके पास काफी सूत्र होते हैं। ऐसे संवाददाताओं से समाचार छूट जाने का प्रश्न ही नहीं उठता।

6. RADIO OR TV (रेडियो व टीवी)
समाचार प्राप्ति के लिए टीवी और रेडियो भी एक महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं। घर बैठे आम आदमी इन्हीं माध्यमों के जरिए देश-विदेश की तमाम समाचारों को जान पाता है। ऐसे समाचार पत्र जिनके संवाददाता किस जगह नहीं है तो उन समाचार पत्रों को टीवी चैनल के माध्यम से ही उस जगह की खबर मिलती है। कई बार समाचार चैनल एक दूसरे की खबरों को देखकर चलाते हैं। हम यह कह सकते हैं कि सभी समाचार चैनल एक-दूसरे के पुरक हैं और एक दूसरे के लिए एक अच्छे स्त्रोत भी हैं। यही कारण है कि सभी मीडिया संस्थानों में टीवी चैनल लगे होते हैं।

7. INTERVIEW OR PRESS CONFRENCE(साक्षात्कार और प्रेस वार्ताएं)
साक्षात्कार और प्रेस वार्तायें भी समाचार प्राप्त करने के अच्छे स्त्रोत हैं। इनसे कभी – कभी ऐसे समाचार भी मिल जाते हैं जो समाचार पत्रों व समाचार चैनलों की लीड यानी मुख्य समाचार बन जाते हैं। कई बार किसी राजनीतिक दल या कंपनी द्वारा प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी मीडिया संस्थानों के संवाददाताओं को आमंत्रित किया जाता है। प्रेस कांफ्रेंस का विषय पहले से ही निर्धारित कर दिया जाता है जिसके बाद उसके संबंध में संवाददाताओं को जानकारी दी जाती है। संवाददात उस विषय से संबंधित प्रश्न भी उस दौरान कर सकते हैं।

Friday, 7 October 2016

जनसत्ता दैनिक



जनसत्ता
जनसत्ता हिन्दी का प्रमुख दैनिक समाचार पत्र है।
जनसत्ता इंडियन एक्सप्रेस समूह का हिन्दी अख़बार है। इसकी स्थापना इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली के संपादक प्रभाष जोशी ने की थी। १९८३ में शुरू हुए इस अखबार ने रातों रात सबको पीछे छोड़ दिया और इसके कई संस्करण निकले। उसके सम्पादक ओम थानवी हैं। जनसत्ता कोलकत्ता, चंडीगढ़ और रायपुर से भी निकलता है।

हिन्दी पत्रकारिता को नया आयाम देने वालों में दिल्ली से प्रकाशित दैनिक 'जनसत्ता' का नाम अग्रणी है। खोजपूर्ण पत्रकारिता को नए तेवर देने का श्रेय यदि किसी पत्र को दिया जा सकता है तो वह है-`जनसत्ता'। अपनी विशेष शैली, आम भाषा, तेज-तर्रार सम्पादकीय लेखों तथा समाचारों के प्रस्तुतीकरण ने इसे न केवल दिल्ली का बल्कि पूरे देश का लोकप्रिय पत्र बना दिया और उसे ही कुछ वर्षों में श्रेष्ठ हिन्दी दैनिक पत्रों में ला खड़ा किया।
खोज खबर, गपशप, किताबें, अर्थात्, इस पत्र के सर्वाधिक लोकप्रिय स्तम्भ हैं। इसका रविवारीय संस्करण `रविवारीय जनसत्ता' विविध सामियक सामग्री से परिपूर्ण है। सामयिक लेख, कविता, कहानी, नन्ही दुनियां, जोगलिखी, देखी-सुनी, महिला जगत्, आदि इसके नियमित स्तम्भ हैं।

प्रकाशन स्थल
जनसत्ता मुख्यालय दिल्ली से प्रकाशित होता है। प्रभाष जोशी के बाद इसके संपादक बने राहुल देव। राहुल देव के बाद अच्युतानंद मिश्र ने इसके संपादक का कार्यभार संभाला। लेकिन उन्हें ठीक से काम नहीं करने दिया गया। इसके पीछे प्रभाष जोशी की शह पर रामबहादुर राय समेत कई पत्रकारों ने अच्युताजी की राह में रोड़े अटकाए। हालांकि बाद में संपादक बने ओम थानवी ने प्रभाष जोशी के नजदीकी लोगों को ही निबटा दिया।

Sunday, 28 February 2016

फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल (एफटीपी)

फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल (एफटीपी) एक नेटवर्क प्रोटोकॉल होता है जिसके द्वारा इंटरनेट आधारित टीसीपी/आईपी नेटवर्क पर फाइलों का आदान-प्रदान किया जाता है। इसे यूजर बेस्ड पासवर्ड या अनॉनिमस यूजर एक्सेस के जरिए काम में लाया जाता है।

फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल या एफटीपी अपने मौजूदा रूप में विभिन्न चरणों से होता हुआ पहुंचा है। सर्वप्रथम 1971 में इसे आरएफसी 114 के नाम से तैयार किया गया था जिसे बाद में आरएफसी 765 से बदला गया जिसे 1985 में आरएफसी 959 से परिवर्तित किया गया। उसके बाद अनेक सुरक्षा संबंधी बदलाव इसमें आए।

सुरक्षा संबंधी यह बदलाव इसलिए लाए गए थे क्योंकि शुरुआत में फाइलें भेजने का यह तरीका बहुत असुरक्षित था। इसका कारण यह था कि फाइल भेजने की प्रक्रिया में कोई भी उसी नेटवर्क पर उस फाइल को चुरा सकता था। एचटीटीपी, एसएमटीपी और टेलनेट से पूर्व यह इंटरनेट प्रोटोकॉल के कार्यक्षेत्र में आने वाली एक आम समस्या थी। इस समस्या का निवारण एसएफटीपी (फाइल ट्रांसफर प्रोटोकॉल) के जरिए ही हो सकता था।

एफटीपी मेल: जहां एफटीपी एक्सेस इस्तेमाल में नहीं आता, वहां रिमोट एफटीपी या एफटीपी मेल इस्तेमाल में लाया जाता है। इसमें एक ईमेल दूसरे एफटीपी सर्वर पर भेजा जाता है जो एफटीपी कमांड पूरी करता है और डाउनलोड फाइल वाली अटैचमेंट वापस भेजता है।

चूंकि अब लगभग हर संस्थान में एफटीपी सर्वर है, इसलिए यह व्यवस्था काम में नहीं आती। अनेक हालिया वेब ब्राउजर और फाइल मैनेजर्स एफटीपी सर्वरों से जुड़ सकते हैं। इससे दूर-दराज से आने वाली फाइलों पर लोकल फाइलों जैसा ही कार्य हो सकता है। इसमें एफटीपी यूआरएल इस्तेमाल में लाया जाता है। फाइल भेजने के अन्य तरीके जैसे एसएफटीपी और एससीपी एफटीपी से नहीं जुड़े होते। इनकी पूरी प्रक्रिया में एसएसएच का इस्तेमाल होता है।


उपयोग
आरएफसी द्वारा प्रस्तुत रूपरेखा के अनुसार, एफटीपी का प्रयोग निम्न के लिए किया जाता है:
फ़ाइलों की साझेदारी को बढ़ावा देना (कंप्यूटर प्रोग्राम और/या डाटा),
दूरवर्ती कंप्यूटरों के परोक्ष या अप्रत्यक्ष उपयोग को प्रोत्साहन देने में,
विभिन्न होस्ट के बीच फ़ाइल संग्रहण प्रणालियों में परिवर्तनों से प्रयोक्ता का परिरक्षण
विश्वसनीय तरीक़े से, तथा दक्षता के साथ डाटा अंतरण करना।
एफटीपी को सक्रिय मोड, निष्क्रिय मोड और विस्तृत निष्क्रिय मोड में संचालित किया जा सकता है। आरएफसी २४२८ द्वारा सितंबर १९९८ में, विस्तृत निष्क्रिय मोड जोड़ा गया था।

Thursday, 25 February 2016

हाइपरलिंक्स




हाइपरलिंक्स (hyperlinks), जिन्हें आमतौर पर "लिंक्स" (links) कहा जाता है, इंटरनेट और वेबसाइट्स का महत्वपूर्ण भाग होती हैं। लिंक्स की मदद से उपयोगकर्ता किसी भी फोटो या टेक्सट पर क्लिक करके दूसरे वेब पेज पर पहुँच सकते हैं। इसलिए वह वेबसाइट्स के लिए आवश्यक होती हैं। हाइपरलिंक्स का निर्माण करने के लिए आपको छोटे से एचटीऍमएल" (HTML) कोड की ज़रूरत पड़ेगी। इस कोड का इस्तेमाल करके आप तुरंत एक लिंक का निर्माण कर पाएँगे। इस बारे में और अधिक पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

भारत में साइबर पत्रकारिता का विकास




सूचना से अधिक महत्वपूर्ण सूचनातंत्र है। माध्यम ही संदेश है नामक पुस्तक में प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैक्लूहन की लिखी उक्त उक्ति आज के दौर में नितान्त प्रासंगिक और समसामयिक है। यह सार्वकालिक सत्य है कि सूचना में शक्ति है। पत्रकारिता तो सूचनाओं का जाल है, जिसमें पत्रकार सूचनाएँ देने के साथ-साथ सामान्य जनता को दिशा निर्देश देता है। उनका पथ प्रदर्शन करता है। एक प्रकार से कहा जाए तो पत्रकारिता वह ज्ञान चक्षु है जिसके माध्यम से पत्रकार अपने विचारों को व्यक्त करता है।
 
प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के बारे में जानने की खास दिलचस्पी होती है और इसके लिए माध्यम सदा ही उपलब्ध रहे हैं। पहले अखबार, फिर टी. वी. और अब इंटरनेट। आज खबरों को जानने का टेस्ट बदल गया है। पहले सिर्फ खबरें जान लेना महत्वपूर्ण होता था, बाद में उनके बहुआयामी पक्ष को जानने की ललक बढ़ी और आज तो खबरों का पोस्टमार्टम ही शुरु हो गया है। निश्चित रुप से इस प्रवृत्ति ने कहीं न कहीं लीक से हटकर कुछ नया करने को बाध्य किया है। इसका एक ताजातरीन उदाहरण है- वेब पत्रकारिता। एक उंगली की क्लिक और पूरी दुनिया आपके सामने। वह भी आपकी अपनी क्षेत्रीय भाषा में। एक जिज्ञासु मन को और क्या चाहिए। उसमें भी अगर टी. वी. और अखबार का आनंद बिना रिमोट का बटन दबाए मिल जाए या फिर अखबारों के पन्ने पलटकर शेष अगले पृष्ठ पर देखने से मुक्ति मिल जाए तो उपभोगवादी समाज के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। शायद आरामतलबी के आदी हो चुके अभिजात्य वर्ग के लिए यह एक वरदान है। वेब पत्रकारिता आज मीडिया का सबसे तेजी से विकसित होने वाला माध्यम बन गया है। अखबारों की तरह वेब पत्र और पत्रिकाओं का जाल अंतर्जाल पर पूरी तरह बिछ चुका है। छोटे बड़े हर शहर से वेब पत्रकारिता संचालित हो रही है। छोटे बड़े सभी शहरों के प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी वेब पर हैं। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में थोड़े ही समय में इसने बड़ा मुकाम पा लिया है। हालांकि इसे अभी और आगे जाना है।
 
आज मीडिया के पूरे बाजार की नजर हिंदी वेब पत्रकारिता पर है। एक अध्ययन के अनुसार योरोप के लोग सही खबरों के लिए समाचार चैनलों और समाचार पत्रों पर कम, ब्लॉगरों पर अधिक विश्वास करते हैं क्योंकि ब्लॉग के माध्यम से आप न सिर्फ दूसरों की विचारधारा से परिचित होते हैं वरन उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं और अपने ब्लॉग के माध्यम से विश्व के कोने-कोने तक अपनी विचारधारा और लेखनी से लोगों को परिचित करा सकते हैं।
इसमें दोराय नहीं कि जितना अधिक पढ़ा जाए उतनी ही बहतर लेखन क्षमता का विकास होता जाता है। अंतरजाल और चिट्ठे इसमें भरपूर योगदान कर रहे हैं। हर विषय पर सामग्री प्राय: मुफ्त में उपलब्ध है।
 
मुद्रित पत्रिकाओं और साहित्य का दायरा आज अंतरजाल के सामने बहुत सीमित हो गया है क्योंकि इनका एक विशिष्ट पाठक वर्ग है किंतु अंतरजाल की कोई भौगोलिक सीमाएँ नहीं हैं और यह विश्व के कोने कोने में लगभग छपते ही तुरंत उपलब्ध हो जाता है। शायद यही इसकी जीत का मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है। हर क्षण कुछ न कुछ नया जुड़ रहा है। अनेक पत्रिकाएँ हैं जो एक स्तरीय सामग्री संयोजित कर पठकों तक ला रही हैं। अंतरजाल पर हिंदी सामग्रियों की संख्या और स्तर दोनों ही बढ़ते जा रहे हैं। हिंदी साहित्य में सूचनाओं का यह माघ्यम प्राण फूँक सकता है। इस भागती दौड़ती दुनिया में सभी के पास समय का अभाव है। किसी को इतनी फुर्सत नहीं कि वह पहले बाजार जाकर पसंद की पत्रिका जगह जगह ढूँढे और फिर उसे खरीदे। आज इंटरनेट पर अभिव्यक्ति, अनुभूति, प्रवक्ता और सृजन गाथा जैसी ऑनलाइन पत्रिकाएँ हैं जिनसे कविताएँ, गज़लें, काहानियाँ आदि सभी विषयों पर प्रचीनतम और नवीनतम दोनों प्रकार की सामग्री बहुतायत में मिल जाती है।
तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखड़ते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें, अखबार और पत्रिकाएँ दोस्त हुआ करती थीं किन्तु आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। लिखे हुए की तत्काल प्रक्रिया ने इसे लोकप्रिय बना दिया है। आज का पाठक सब कुछ इंन्स्टेंट चाहता है। इंटरनेट ने उसकी इस भूख को पूरा किया है। वेबसाइट्स ने दुनिया की तमाम भाषाओं में हो रहे काम और सूचनाओं का रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। नयी पीढ़ी आज ज्यादातर सूचना या पाठय सामग्री की तलाश में वेबसाइट्स पर विचरण करती है।
 
भारत जैसे देश में जहाँ साहित्यिक पत्रिकाओं का संचालन बहुत कठिन और श्रमसाध्य काम है वहीं वेब पर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन सिर्फ आपकी तकनीकी दक्षता और कुछ आर्थिक संसाधनों के माध्यम से जीवित रह सकता है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि वेब पत्रिका का टिका रहना उसकी सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, न कि विपड़न रणनीति पर। जबकि मुद्रित पत्रिकाएँ और अखबार अपनी विपड़न रणनीति और अर्थ प्रबंधन के बल पर ही जीवित रह पाते हैं।
अखबारों के प्रकाशन में लगने वाली बड़ी पूंजी के कारण उसके हित और सरोकार निरंतर बदल रहे हैं। इस दृष्टिकोण से भी इंटरनेट ज्यादा लोकतांत्रिक दिखता है। वेबसाइट बनाने और चलाने का खर्चा भी कम है और ब्लॉग तो नि:शुल्क है ही। यहाँ एक पाठक खुद संपादक और लेखक बनकर इस मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। स्वभाव से ही लोकतांत्रिक माध्यम होने के नाते संवाद यहाँ सीधा और सुगम है। भारतीय समाज में तकनीक को लेकर हिचक के कारण वेब माध्यम अभी इतने प्रभावी नहीं दिखाई देते परंतु यह तकनीक सही अर्थों में निर्बल का बल है। इस तकनीक के इस्तमाल ने एक अंजाने से लेखक को भी ताकत दी है जो अपनी रचनाशीलता के माध्यम से अपने दूरस्थ दोस्तों को भी उससे जोड़ सकता है। वेब पत्रकारिता करने वालों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है। उनकी खबर एक पल में सारी दुनिया में पहुंच जाती है, जो कि अन्य समाचार माध्यमों के द्वारा संभव नहीं है। मीडिया का लोकतंत्रीकरण करने में वेब पत्रकारिता की मुख्य भूमिका दिखई देती है। विकसित तकनीक की उपलब्धता के कारण वेब पत्रकारिता को नित नये नये आयाम मिल रहे हैं। पहले केवल टेक्स्ट ही उपलब्ध हो पाता था परंतु अब चित्र, वीडियो व ऑडियो आदि भी बड़ी आसानी से विश्व के किसी भी कोने में भेजे जा सकते हैं।
 
एक सीमित संसाधन वाला व्यक्ति भी हाई स्पीड सेवाओं को आसानी से प्राप्त कर लेता है। अंतर्जाल पर उपलब्ध साहित्य और पत्रिकाओं को कहीं भी देखा जा सकता है। यहाँ तक कि काम के बीच बचे खाली समय का इस्तेमाल भी इस तरह से बखूबी हो सकता है जबकि मुद्रित पत्रिकाओं को साथ में लेकर चलना हर वक्त संभव नहीं होता।
 
जहाँ तक वेब पत्रकारिता में चुनौतियाँ और संभावनाओं का सवाल है, तो इसका भविष्य उज्ज्वल है और इसमें विकास की प्रबल संभावनाएँ हैं। देश में शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है और शहरीकरण तेजी से हो रहा है। साथ ही तकनीक के विकास ने आज शहरों में हर घर में अपनी पहुंच बना ली है। तकनीक के लिए रोने वाला देश अब भारत नहीं रहा। कंप्यूटर, लैपटॉप, पामटौप घर घर की मूल आवश्यकता हो गयी है। तकनीक का रोना कहीं नहीं है। रोना उस पहल का है जहाँ अंतर्जाल भी हिंदी पत्रकारिता का इस्तंभ बन कर निकले।
 
आज अखबारों की तरह वेब पत्र और पत्रिकाओं का जाल अंतर्जाल पर पूरी तरह बिछ चुका है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता हे कि भारत में थोड़े ही समय में इसने बड़ा मुकाम पा लिया है, हालांकि समय अभी शेष है और इसे अभी बहुत दूर जाना है। भारत में अभी भी वेब पत्रकारिता की पहुंच प्रथम पंक्ति में खड़े लोगों तक ही सीमित है। धीरे धीरे मध्यम वर्ग भी इसमें शामिल हो रहा है। जहाँ तक अंतिम कतार में खड़े लोगों तक पहुंचने की बात है तो अभी यह बहुत दूर है।
भारत में वेब पत्रकारिता का विकास तो हो रहा है लेकिन कुछ समस्याएँ इसके तेजी से विकसित होने में आड़े आ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए एक कंप्यूटर और इंटरनेट सेवा का होना आवश्यक है और इन पर कए अच्छी खासी लागत आती है। भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग गाँवों में रहता है। शहरी बाजार की तुलना में ग्रामीण बाजार बहुत बड़ा है लेकिन गाँवों के समुचित विकास और पिछड़ेपन की वजह यहाँ का आर्थिक संकट है। साथ ही भारत में बिजली की समस्या गंभीर है। इसकी वजह से साइबर कैफे ठीक से कार्य नहीं कर पाते और लोग इसका समुचित लाभ नहीं ले पाते। वेब पत्रकारिता का सबसे ज्यादा फायदा विदेशों में रहने वाले लोग उठा रहे हैं। हिंदी फॉन्ट की समस्या भी हिंदी वेब पत्रकारिता के विकास को धीमा कर रही है। इसी समस्या की वजह से हिंदी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता देर से शुरु हो पायी। हालांकि अब लगभग सभी ई अखबार अपने अपने संसकरण के साथ डाउनलोड करने के लिए फॉन्ट भी देने लगे हैं।
 
वेब पत्रकारिता के मार्ग में एक समस्या अलग से टीम न होने की भी है जिसकी वजह से मौलिकता का ईभाव रहता है और खबरें अपडेट नहीं हो पातीं। वेब पत्रकारिता को व्यापक बनाने के लिए आवश्यक है कि इसके लिए अलग से रिपोर्टर रखे जाएँ जो ऑनलाइन रिपोर्ट फाइल तैयार करें। वेब पत्रकारिता को स्थायी रूप से स्थापित करने के लिए इसमें मौलिकता का होना अति आवश्यक है।
इन कतिपय कमियों के बावजूद इतना निश्चित है कि आने वाले दिनों में वेब पत्रकारिता को वह सम्‍मान हासिल होगा जो प्रिन्ट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने पाया है। वेब पत्रकारिता जो व्यवहार में प्रिन्ट और इलेक्ट्रोनिक दोनों पत्रकारिताओं को समेटे हुए है और जिसकी गति के आगे बाकी सारी तकनीकें कहीं नहीं ठहरतीं, अन्य पत्रकारिताओं के लिए एक चुनौती से कम नहीं है। इसके विकास की गति बताती है कि जल्दी ही यह बाकी माध्यमों को पीछे छोड़ देगी। हाँ, इतना अवश्य है कि जहाँ कंप्यूटर या इंटरनेट की सुविधा ही न हो, बिजली या वैसी उर्जा की व्यवस्था न हो, मॉडम न हो वहाँ यह प्रणाली नहीं जा सकती। पर जहाँ ये सुविधाएँ हैं वहाँ वेब पत्रकारिता के लिए अलग से कुछ ज्यादा करने की जरुरत नहीं होती। एक बार ये सुविधाएँ मिल जाने पर काम इतना सस्ता, सुविधाजनक ओर तेज होता है कि अन्य माध्यमों पर जाने की इच्छा ही नहीं होती।

 वेब पत्रकारिता में संभावनाएँ इस दृष्टि से और भी प्रबल हो जाती हैं कि प्रिन्ट मीडिया की किसी भी खबर के लिए अखबार में कम से कम आठ घन्टे तक समाचारों के लिए इंतजार करना पड़ता है, दूसरी ओर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में समय को लेकर कोइ पाबंदी नहीं है। ऐसे में समय और उपलब्धता के साथ ही तात्कालिकता के लिहाज से मीडिया का यह माध्यम ज्यादा कारगर साबित हो सकता है।
 
और, अभी चाहे मात्र प्रसार पाने की अभिलाषा हो या इस नये धंधे में उतरने की संभावनाएँ परखने की इच्छा हो, आज शायद ही कोइ अखबार, पत्रिका, रेडियो या टी. वी. चैनल होगा जो वेब पर उपलब्ध न हो और वह भी लगभग मुफ्त। टी. वी. पर विचार पक्ष कमजोर पड़ जाता है और प्रिन्ट में दृश्य श्रव्य की अनुपस्थिति जैसी कमियाँ खटकती हैं लेकिन वेब माध्यम इन दोनों ही कमियों को एक साथ पूरा करता है। यह पढ़ने की सामग्री भी दे सकता है और चलती तस्वीरें और आवाज भी। इसमें पाठक या दर्शक की भगीदारी किसी भी अन्य माध्यम की तुलना में ज्यादा होती है। इसमें काइ संदेह नहीं कि वेब पत्रकारिता समाचार माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आ रही है, खासकर मुद्रित माध्यमों के लिए। हो सकता है कि इलेक्ट्रोनिक माध्यम मुद्रित माध्यमों को बहुत अधिक नुकसान न पहुंचा पाये हों लेकिन यह माध्यम मुद्रित व इलेक्ट्रोनिक दोनों के लिए चुनौती साबित हो रहा है। जिस तरह से वेब पत्रकारिता में राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निवेश कर रही हैं और वेब पत्रकारिता ने जिस तरह अपनी प्ररंभिक अवस्था में ही अपनी खबरों को विशिष्ट रूप देना प्ररंभ कर दिया है वह परंपरागत माध्यमों के लिए खतरे की घंटी है। इसका उदाहरण तहलका डॉट कॉम की मैच फिक्सिंग और रक्षा सौदों में घूसखोरी की कवरेज को कहा जा सकता है। अभी तक विशिष्ट समाचारों के लिए इलेक्ट्रोनिक माध्यम भी अखबारों आदि पर निर्भर थे लेकिन अब विशेष खबरों के लिए आम पाठक वर्ग तथा परंपरागत माध्यम वेब पत्रकारिता के मोहताज हो जायेंगे।
 
संक्षेप में आज के आपाधापी के युग में रफ्तार का बहुत महत्व है और वेब पत्रकारिता उस पैमाने पर खरी उतर रही है। वो पाठकों को हर जानकारी उस जगह और उस वक्त सुलभ कराती है जिस जगह और जिस वक्त वे उसकी मांग करते हैं। इस प्रकार वेब पत्रकारिता अन्य माध्यमों को सशक्त चुनौती दे रही है। उसके विकास की अपार संभावनाएँ हैं। वस्तुत: वेब पत्रकारिता ने वसुधैव कुटुम्बकम्के नारे को चरितार्थ कर दिया है।